कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

नवम्बर 16, 2007

है इख्तियार में तेरे


है इख्तियार में तेरे तो मोज़दा कर दे,
वो शख्स मेरा नही है उसे मेरा कर दे,

यह रेक्ज़ार कहीं खत्म ही नही होता,
ज़रा सी दूर तो रास्ता हरा भरा कर दे,

मैं उसके शोर को देखूं वो मेरा सब्र-ओ-सुकून,
मुझे चिराग बना दे उसे हवा कर दे,

अकेली शाम बहुत ही उदास करती है,
किसी को भेज, कोई मेरा हमनवा कर दे,

ये भी क्या एहसान कम है


ये भी क्या एहसान कम है देखिये न आप का,
हो रहा है हर तरफ़ चर्चा हमारा आप का,

चाँद में तो दाग है पर आप में वो भी नही,
चौध्वी के चाँद से बढ़के है चेहरा आप का,

इश्क में ऐसे भी हम डूबे हुए हैं आप के,
अपने चेहरे पे सदा होता है धोखा आप का,

चाँद-सूरज, धुप-सुबह, कहकशा तारे शमा,
हर उजाले ने चुराया है उजाला आप का,

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