कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

दिसम्बर 6, 2007

नज़र वो है के


नज़र वो है के जो कौन-ओ-मकां के पार हो जाये,
मगर जब रू-ए-ताबां पर पड़े बेकार हो जाये,

नज़र उस हुस्न पर ठहरे तो आख़िर किस तरह ठहरे,
कभी जो फूल बन जाये कभी रुख़सार हो जाये,

चला जाता हूं हंसता खेलता मौज-ए-हवादिस से,
अगर आसानियां हों ज़िंदगी दुशवार हो जाये,

Lyrics: Asghar Gondavi
Singer: Jagjit Singh

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2 टिप्पणियाँ »

  1. अमरजीत सिंह जी,
    पहले तो आपको बहुत बहुत शुक्रिया जो आपने जगजीत सिंह साहब की गजलों को इतनी मेहनत करके नेट पर उतारा है.

    मैं भी उनका फेन हूँ . इस ग़ज़ल के बारे में आप कुछ बतैंगे क्यों की कहकशां में ये ग़ज़ल मैंने कभी नही सुनी. ये vol. १ मे है या vol. २ में ?
    या फिर ये ग़ज़ल cd और cassettes में नहीं आई है?

    टिप्पणी द्वारा Nitesh S — दिसम्बर 31, 2007 @ 10:46 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  2. गोण्डवी साहब की इस लाइन के ‘कभी जो फूल बन जाए कभी रुखसार हो जाए’ का अलहदा मज़ा है।

    टिप्पणी द्वारा चन्द्र भूषण मिश्र 'ग़ाफ़िल' — नवम्बर 30, 2010 @ 11:20 अपराह्न | प्रतिक्रिया


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