कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

जून 18, 2008

वस्ल की रात


वस्ल की रात तो राहत से बसर होने दो
शाम से ही है ये धमकी के सहर होने दो

जिसने ये दर्द दिया है वो दवा भी देगा
लादवा है जो मेरा दर्द-ए-जिगर होने दो

ज़िक्र रुख़सत का अभी से न करो बैठो भी
जान-ए-मन रात गुज़रने दो सहर होने दो

वस्ल-ए-दुश्मन की ख़बर मुझ से अभी कुछ ना कहो
ठहरो ठहरो मुझे अपनी तो ख़बर होने दो

Singer: Jagjit Singh

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4 टिप्पणियाँ »

  1. jikr rukhsat ka na karo abhise baitho bhi
    jaan-e-man raat gujarne do sahar hone do

    kitni khoobsurat baat kahi hai
    gazal ka har sher bahut sundar hai
    kya aap bata sakte hain ki ye gazal kisne likhi hai

    टिप्पणी द्वारा renu — अप्रैल 5, 2009 @ 10:38 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  2. bahut khoob

    टिप्पणी द्वारा kislay — सितम्बर 7, 2009 @ 9:11 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  3. great ghazal

    टिप्पणी द्वारा carpool — सितम्बर 7, 2009 @ 9:12 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  4. gydgamdonqhp

    टिप्पणी द्वारा mihvfpqdgrxm — जून 27, 2013 @ 10:38 अपराह्न | प्रतिक्रिया


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