कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

मई 17, 2012

तन्हा-तन्हा हम रो लेंगे


तन्हा-तन्हा हम रो लेंगे महफ़िल-महफ़िल गायेंगे,
जब तक आंसू साथ रहेंगे तब तक गीत सुनायेंगे,

तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं,
देर न करना घर जाने में वरना घर खो जायेंगे,

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारें छूने दो,
चार किताबे पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जायेंगे,

किन राहों से दूर है मंजिल कौन सा रास्ता आसान है,
हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे,

अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर दिल हों मुमकिन है,
हम तो उस दिन रायें देंगे जिस दिन धोखा खायेंगे..

न शिवाले न कालिस न हरम


न शिवाले न कालिस न हरम झूठे हैं,
बस यही सच है के तुम झूठे हो हम झूठे हैं,

हमने देखा ही नहीं बोलते उनको अब तक,
कौन कहता है के पत्थर के सनम झूठे हैं,

उनसे मिलिए तो ख़ुशी होती है उनसे मिलकर,
शहर के दुसरे लोगों से जो कम झूठे हैं,

कुछ तो है बात जो तहरीरों में तासीर नहीं,
झूठे फनकार नहीं हैं तो कलम झूठे हैं..

क्या खबर थी इस तरह से


क्या खबर थी इस तरह से वो जुदा हो जाएगा,
ख्वाब में भी उसका मिलना ख्वाब सा हो जाएगा,

ज़िन्दगी थी क़ैद हम-में क्या निकालोगे उसे,
मौत जब आ जायेगी तो खुद रिहा हो जाएगा,

दोस्त बनकर उसको चाहा ये कभी सोचा न था,
दोस्ती ही दोस्ती में वो खुदा हो जाएगा,

उसका जलवा होगा क्या जिसका के पर्दा नूर है,
जो भी उसको देख लेगा वो फ़िदा हो जाएगा..

खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे


खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे,
के अपने सिवा कुछ दिखाई न दे,

खतावार समझेगी दुनिया तुझे,
के इतनी जियादा सफाई न दे,

हंसो आज इतना के इस शोर में,
सदा सिसकियों की सुनायी न दे,

अभी तो बदन में लहू है बहुत,
कलम छीन ले रोशनाई न दे,

खुदा ऐसे एहसास का नाम है,
रहे सामने और दिखाई न दे..

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