कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

मई 21, 2012

चाँद से फूल से


चाँद से फूल से या मेरी जुबां से सुनिए,
हर तरफ आप का किसा जहां से सुनिए,

सब को आता है दुनिया को सता कर जीना,
ज़िंदगी क्या मुहब्बत की दुआ से सुनिए,

मेरी आवाज़ पर्दा मेरे चहरे का,
मैं हूँ खामोश जहां मुझको वहां से सुनिए,

क्या ज़रूरी है की हर पर्दा उठाया जाए,
मेरे हालात अपने अपने मकान से सुनिए..

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3 टिप्पणियाँ »

  1. उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ
    ढूँढने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ

    मेहरबाँ होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
    मैं गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूँ

    डाल कर ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा
    कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी के मिटा भी न सकूँ

    ज़ब्त कमबख़्त ने और आ के गला घोंटा है
    के उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ

    ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना
    क्या कसम है तेरे मिलने की के खा भी न सकूँ

    उस के पहलू में जो ले जा के सुला दूँ दिल को
    नींद ऐसी उसे आए के जगा भी न सकूँ

    नक्श-ऐ-पा देख तो लूँ लाख करूँगा सजदे
    सर मेरा अर्श नहीं है कि झुका भी न सकूँ

    बेवफ़ा लिखते हैं वो अपनी कलम से मुझ को
    ये वो किस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ

    इस तरह सोये हैं सर रख के मेरे जानों पर
    अपनी सोई हुई किस्मत को जगा भी न सकूँ

    टिप्पणी द्वारा jayanti — अप्रैल 4, 2013 @ 11:56 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  2. Hey…before you do that they made an announcement at church this week that one of the women is dealing with a lot taking care of her ill husband and au Click http://www.l33turl.com/moon09180

    टिप्पणी द्वारा sanjuanitamaxwell3 — अप्रैल 9, 2016 @ 3:36 अपराह्न | प्रतिक्रिया

  3. वाह बहुत खूब बढ़िया ग़ज़ल

    टिप्पणी द्वारा Prabal Pushpendra Dwivedi — सितम्बर 28, 2017 @ 3:37 अपराह्न | प्रतिक्रिया


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