कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

मई 8, 2012

ये करें और वो करें


ये करें और वो करें ऐसा करें वैसा करें,
ज़िन्दगी दो दिन की है दो दिन में हम क्या क्या करें,

जी में आता है की दें परदे से परदे का जवाब,
हम से वो पर्दा करें दुनिया से हम पर्दा करें,

सुन रहा हूँ कुछ लुटेरे आ गये हैं शहर में,
आप जल्दी बांध अपने घर का दरवाजा करें,

इस पुरानी बेवफ़ा दुनिया का रोना कब तलक,
आइये मिलजुल के इक दुनिया नयी पैदा करें..

अक्टूबर 6, 2007

जहाँ जहाँ मुझे सेहरा दिखायी देता है


जहाँ जहाँ मुझे सेहरा दिखायी देता है,
मेरी तरह से अकेला दिखायी देता है,

यह एक अब्र का टुकडा कहाँ कहाँ बरसे,
तमाम दस्त ही प्यासा दिखायी देता है,

यह किस मकाम पे लाई है जुस्तजू तेरी,
जहाँ से अर्श भी नीचा दिखायी देता है..

अक्टूबर 16, 2006

अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे


अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे।
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे।

ऐ नए दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना
पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे।

आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी
कोई आँसू मेरे दामन पर बिखर जाने दे।

ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको
सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे।


माज़ी = Past

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .