कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 16, 2007

तुम को हम दिल में बसा लेंगे तुम आओ तो सही


तुम को हम दिल में बसा लेंगे तुम आओ तो सही,
सारी दुनिया से छुपा लेंगे तुम आओ तो सही,

एक वादा करो अब हम से न बिछडोगे कभी,
नाज़ हम सारे उठा लेंगे तुम आओ तो सही,

बेवफा भी हो सितमगर भी जफ़ा पेशा भी,
हम खुदा तुम को बना लेंगे तुम आओ तो सही,

राह तारीक है और दूर है मंज़िल लेकिन,
दर्द की शमें जला लेंगे तुम आओ तो सही,

सफर मे धुप तो होगी जो चल सको तो चलो


सफर मे धुप तो होगी जो चल सको तो चलो,
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो,

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती है,
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो,

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता,
मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो,

यही है जिन्दगी कुछ ख्वाब चाँद उम्मीदें,
इन्ही खिलोनों से तुम भी बहल सको तो चलो,

देने वाले मुझे मौजों की रवानी दे दे


देने वाले मुझे मौजों की रवानी दे दे,
फिर से एक बार मुझे मेरी जवानी दे दे,

अब्र तो जाम हो साकी हो मेरे पहलू में,
कोई तो शाम मुझे ऐसी सुहानी दे दे,

नशा आ जाए मुझे तेरी जवानी की क़सम,
तू अगर जाम में भर के मुझे पानी दे दे,

हर जवान दिल मेरे अफसाने को दोहराता रहे,
हश्र तक ख़त्म न हो ऐसी कहानी दे दे,

फिर उसी राहगुज़र पर शायद


फिर उसी राहगुज़र पर शायद,
हम कभी मिल सकें मगर शायद,

जान पहचान से क्या होगा,
फिर भी ऐ दोस्त गौर कर शायद,

मुन्तज़िर जिन के हम रहे उन को,
मिल गए और हमसफ़र शायद,

जो भी बिछडे हैं कब मिले हैं “फ़र्ज़”,
फिर भी तू इंतज़ार कर शायद,

ऐसा लगता है जिन्दगी तुम हो


ऐसा लगता है जिन्दगी तुम हो,
अजनबी कैसे अजनबी तुम हो,

अब कोई आरजू नहीं बाकी,
जुस्तजू मेरी आखरी तुम हो,

मैं ज़मीन पर घना अँधेरा हूँ,
आसमानों की चांदनी तुम हो,

दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदें,
किस ज़माने के आदमी तुम हो,

दिसम्बर 27, 2006

मै चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले


मै चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-माज़ी के औराक़ उलट के देख ज़रा
ना जाने कौन सा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही करीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासला निकले

माज़ी == past
औराक़ == pages
सफ़हा == page

दिसम्बर 19, 2006

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं


हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

निगाह-ए-दिल की येही आखिरी तमन्ना है..
तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये मे शाम करता चलूं..

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
उन्हे येह ज़िद है कि मुझे देखकर किसी और को ना देख..

मेरा येह शौक, कि सबसे कलाम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

ये मेरे ख्वाबों की दुनिया नहीं, सही..
अब आ गया हूं तो दो दिन कयाम करता चलूं..

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

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