कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

नवम्बर 6, 2007

रिश्ता ये कैसा है नाता ये कैसा है


रिश्ता ये कैसा है नाता ये कैसा है,
पहचान जिस से नहीं थी कभी,
अपना बना है वही अजनबी,
रिश्ता ये कैसा है नाता ये कैसा है,

तुम्हे देखते ही रहूं मै,
मेरे सामने यूं ही बैठे रहो तुम,
करूं दिल की बातें मै खामोशियों से,
और अपने लबों से ना कुछ भी कहो तुम,

ये रिश्ता है कैसा ये नाता है कैसा,
तेरे तन की ख़ुशबू भी लगती है अपनी,
ये कैसी लगन है ये कैसा मिलन है,
तेरे दिल की धड़कन भी लगती है अपनी,

तुम्हे पा के महसूस होता है ऐसे,
के जैसे कभी हम जुदा ही नहीं थे,
ये माना के जिस्मों के घर तो नये हैं,
मगर हैं पुराने ये बंधन दिलों के,

फिर आज मुझे तुमको


फिर आज मुझे तुमको बस इतना बताना है,
हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है,

मधुबन हो या गुलशन हो पतझड़ हो या सावन हो,
हर हाल में इन्सां का इक फूल सा जीवन हो,
काँटों में उलझ के भी खुशबू ही लुटाना है,
हँसना ही जीवन है हंसते ही जाना है,

हर पल जो गुज़र जाये दामन को तो भर जाये,
ये सोच के जी लें तो तक़दीर संवर जाये,
इस उम्र की राहों से खुशियों को चुराना है,
हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है,

सब दर्द मिटा दें हम हर ग़म को सज़ा दें हम,
कहते हैं जिसे जीना दुनिया को सिखा दें हम,
ये आज तो अपना है कल भी अपनाना है,
हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है,

अक्टूबर 16, 2006

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो


ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी।
मग़र मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।

मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी,
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी,
वो नानी की बातों में परियों का डेरा,
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा,
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई,
वो छोटी-सी रातें वो लम्बी कहानी।

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना,
वो गुड़िया की शादी पे लड़ना-झगड़ना,
वो झूलों से गिरना, वो गिर के सँभलना,
वो पीतल के छल्लों के प्यारे-से तोहफ़े,
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी।

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरौंदे बनाना,बना के मिटाना,
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी,

वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी,
न दुनिया का ग़म था, न रिश्तों का बंधन,
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िन्दगानी।

WordPress.com पर ब्लॉग.