कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

मई 4, 2012

कभी गुंचा कभी शोला कभी शबनम की तरह


कभी गुंचा कभी शोला कभी शबनम की तरह,
लोग मिलते हैं बदलते हुए मौसम की तरह,

मेरे महबूब मेरे प्यार को इलज़ाम न दे,
हिज्र में ईद मनाई है मुहर्रम की तरह,

मैंने खुशबू की तरह तुझको किया है महसूस,
दिल ने छेड़ा है तेरी याद को शबनम की तरह,

कैसे हमदर्द हो तुम कैसी मसीहाई है,
दिल पे नश्तर भी लगाते हो तो मरहम की तरह..

कभी तो खुल के बरस


कभी तो खुल के बरस अब के मेहरबान की तरह,
मेरा वजूद है जलते हुए मकां की तरह,

मैं इक ख्वाब सही आपकी अमानत हूँ,
मुझे संभाल के रखियेगा जिस्म-ओ-जान की तरह,

कभी तो सोच के वो साक्ष किस कदर था बुलंद,
जो बिछ गया तेरे क़दमों में आसमान की तरह,

बुला रहा है मुझे फिर किसी बदन का बसंत,
गुज़र न जाए ये रूठ भी कहीं खिज़ां की तरह..

तेरे खुशबु में बसे ख़त


तेरे खुशबु में बसे ख़त मैं जलाता कैसे,
जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा,
जिनको इक उम्र कलेजे से लगाए रखा,

जिनका हर लफ्ज़ मुझे याद था पानी की तरह ,
याद थे मुझको जो पैगाम-इ-जुबानी की तरह,
मुझ को प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह,

तूने दुनिया की निगाहों से जो बचाकर लिखे ,
सालाहा-साल मेरे नाम बराबर लिखे,
कभी दिन में तोह कभी रात में उठकर लिखे,

तेरे खुशबु में बसे ख़त मैं जलाता कैसे,
प्यार में दूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे,
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे,

तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ,
आग बहेती हुए पानी में लगा आया हूँ…

अक्टूबर 6, 2007

मंज़िल न दे चराग न दे हौसला तो दे


मंज़िल न दे चराग न दे हौसला तो दे,
तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे,

मैंने ये कब कहा के मेरे हक में हो जवाब,
लेकिन खामोश क्यूँ है तू कोई फैसला तो दे,

बरसों मैं तेरे नाम पे खाता रहा फरेब,
मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे,

बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार,
लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे,

अक्टूबर 5, 2007

ये तो नही के गम नही


ये तो नही के गम नही,
हाँ मेरी आँख नम नही,

तुम भी तो तुम नहीं हो आज,
हम भी तो आज हम नही,

अब न खुशी की है खुशी,
गम का भी अब तो गम नही,

मौत अगर चेमौत है,
मौत से ज़ीस्त कम नही,

ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे


ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे,
यह छलकती हुयी आखो को भी पत्थर कर दे,

तुझ को देखा नही, महसूस किया है मैंने,
आ किसी  दिन मेरे अहसास को पय्कर कर दे,

और कुछ डर मुझे, डरकर नही है लकिन,
मेरी चादर मेरे पैरो के, बराबर कर दे,

दिसम्बर 19, 2006

सोचा नहीं अच्छा-बुरा


सोचा नहीं अच्छा-बुरा, देखा-सुना कुछ भी नहीं..
मांगा खुदा से रात-दिन, तेरे सिवा कुछ भी नहीं..

देखा तुझे, सोचा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे..
मेरी खता मेरी वफ़ा, तेरी खता कुछ भी नहीं..

जिस पर हमारी आंख ने मोती बिछाये रात-भर..
भेजा वोही कागज़ उन्हे, लिखा मगर कुछ भी नहीं..

एक शाम की दहलीज पर, बैठे रहे वो देर तक..
आंखों से की बातें बहुत, मुह से कहा कुछ भी नहीं..

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