कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 17, 2007

तुम ने बदले हम से गिन गिन के लिए


तुम ने बदले हम से गिन गिन के लिए,
हमने क्या चाह था इस दिन के लिए,

वस्ल का दिन और इतना मुख्तसर,
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए,

वोह नहीं सुनते हमारी क्या करें,
मांगते हैं हम दुआ जिन के लिए,

चाहने वालों से गर मतलब नहीं,
आप फिर पैदा हुए किन के लिए,

बागबां कलियाँ हों हलके रंग की,
भेजनी हैं एक कमसिन के लिए,

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जीते रहने की सज़ा दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी


जीते रहने की सज़ा दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी,
अब तो मरने की दुआ दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी,

मैं तो अब उकता गया हूँ क्या यही है कायेनात,
बस ये आइना हटा दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी,

धुंडने निकला था तुझको और ख़ुद को खो दिया,
तू ही अब मेरा पता दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी,

या मुझे अहसास की इस कैद से कर दे रिहा,
वर्ना दीवाना बना दे जिन्दगी ऐ जिन्दगी,

जिन्दगी तुने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं


जिन्दगी तुने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं,
तेरे दामन मैं मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं,

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो,
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं,

हम ने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ,
सामने जिन के वो सच मुच का खुदा कुछ भी नहीं,

या खुदा अब के ये किस रंग में आई है बहार,
ज़र्द ही ज़र्द है पेडो पे हरा कुछ भी नहीं,

दिल भी एक जिद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह,
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं,

सच्ची बात कही थी मैंने


सच्ची बात कही थी मैंने,
लोगों ने सूली पे चढाया,
मुझ को ज़हर का जम पिलाया,
फिर भी उन को चैन न आया,

सच्ची बात कही थी मैंने,
ले के जहाँ भी, वक्त गया है,
ज़ुल्म मिला है, ज़ुल्म स्सहा है,
सच का ये इनाम मिला है,

सच्ची बात कही थी मैंने,
सब से बेहतर कभी न बनना,
जग के रहबर कभी न बनना,
पीर पयाम्बर कभी न बनना,

चुप रह कर ही वक्त गुजारो,
सच कहने पे जान मत वारो,
कुछ तो सीखो मुझ से यारो,

सच्ची बात कही थी मैंने,

बे सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है


बे सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है,
हम खफा कब थे मनाने की ज़रूरत क्या है,

आप के दम से तो दुनिया का भरम है कायम,
आप जब हैं तो ज़माने की ज़रूरत क्या है,

तेरा कूचा, तेरा डर, तेरी गली काफी है,
बे-ठिकानों को ठिकाने की ज़रूरत क्या है,

दिल से मिलने की तमन्ना ही नहीं जब दिल में,
हाथ से हाथ मिलाने की ज़रूरत क्या है,

रंग आंखों के लिए, बू है दिमागों के लिए,
फूल को हाथ लगाने की ज़रूरत क्या है,

शेख़ जी थोड़ी सी पी कर आइये


शेख़ जी थोड़ी सी पी कर आइये,
मए है क्या सही फिर हमें बतलाइए,

आप क्यों हैं सारी दुनिया से जुदा,
आप भी दुश्मन मेरे बन जाइए,

क्या है अच्छा क्या बुरा बन्दा नवाज़,
आप समझें तो हमें समझाइए,

जाने दिज्ये अक्ल बातें जनाब,
दिल की सुनिये और पीते जाइए,

कोई मौसम ऐसा आए


कोई मौसम ऐसा आए,
उस को अपने साथ जो लाये,

लोगों से तारीफ सुनी है,
उस से मिल कर देखा जाए,

आज भी दिल पर बोझ बहुत है,
आज भी शायद नींद न आए,

हाल है दिल का जुगनू जैसा,
जलता जाइये बुझता जाए,

बीते लम्हे कुछ ऐसे हैं,
खुशबू जैसे हाथ न आए,

दैरो हरम मैं बसने वालो


दैरो हरम मैं बसने वालो,
मए खानों में फुट न डालो,

तूफान से हम टकराएँगे,
तुम अपनी कश्ती को संभालो,

मएखाने में आए वायेज़,
इन को भी इन्सान बना लो,

आरिज़-ओ-लब सादा रहने दो,
ताजमहल पे रंग न डालो,

अक्टूबर 13, 2006

प्यार का पहला ख़त

Filed under: Albums,Face to Face,Jagjit Singh — Amarjeet Singh @ 3:25 अपराह्न
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प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है
नये परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है।

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था,
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है।

गाँठ अगर पड़ जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी,
लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है।

हमने इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल तो ढूँढ़ लिया है,
गहरे ज़ख़्मों को भरने में वक़्त तो लगता है।

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