कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

मई 21, 2012

चाँद से फूल से


चाँद से फूल से या मेरी जुबां से सुनिए,
हर तरफ आप का किसा जहां से सुनिए,

सब को आता है दुनिया को सता कर जीना,
ज़िंदगी क्या मुहब्बत की दुआ से सुनिए,

मेरी आवाज़ पर्दा मेरे चहरे का,
मैं हूँ खामोश जहां मुझको वहां से सुनिए,

क्या ज़रूरी है की हर पर्दा उठाया जाए,
मेरे हालात अपने अपने मकान से सुनिए..

अक्टूबर 12, 2006

जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलोना है


जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलोना है
दो आँखो मे एक से हसँना एक से रोना है

जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है
हर जीवन जीवन जीने का समझौता है
अब तक जो होता आया है वो ही होना है

रात अन्धेरी भोर सुहानी यही ज़माना है
हर चादर मे दुख का ताना सुख का बाना है
आती साँस को पाना जाती साँस को खोना है

अक्टूबर 10, 2006

बदला ना अपने आप को जो थे वही रहे


बदला ना अपने आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे

ढुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम
थोड़ी बहुत तो ज़हन मे नाराज़गी रहे

अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी करीब रहे दुर ही रहे

गुज़रो जो बाग से तो दुआ मांगते चलो
जिसमे खिले है फुल वो डाली हरी रहे

अक्टूबर 7, 2006

अपना गम ले के कही और ना जाया जाये


अपना गम ले के कही और ना जाया जाये
घर मे बिखरी हुई चीजो को सजाया जाये
जिन चिरागो को हवाओ का कोई खौफ़ नही
ऊन चिरागो को हवाओ से बचाया जाये
बाग मे जाने के आदाब हुआ करते है
किसी तित्ली को न फूलो से उडाया जाये
घर से मस्जिद है बहुत दुर चलो यू कर ले
किसी रोते हुये बच्चे को हसँया जाये

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