कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 16, 2006

एक ना एक शम्मा जलाये रखिये


एक ना एक शम्मा अन्धेरे में जलाये रखिये
सुब्ह होने को है माहौल बनाये रखिये

(शम्मा : lamp, candle-light; सुब्ह : morning; माहौल : environment)

जिन के हाथों से हमें ज़ख्म-ए-निहाँ पहुँचे हैं
वो भी कहते हैं के ज़ख्मों को छुपाये रखिये

(ज़ख्म-ए-निहाँ : concealed wounds)

कौन जाने के वो किस राह-गुज़र से गुज़रे
हर गुज़र-गाह को फूलों से सजाये रखिये

(राह-गुज़र : pathway; गुज़र-गाह : pathway)

दामन-ए-यार की ज़ीनत ना बने हर आँसू
अपनी पलकों के लिए कुछ तो बचाये रखिये

(दामन-ए-यार : lap of the beloved; ज़ीनत : ornament, decoration)

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रात भी, नींद भी, कहानी भी


रात भी, नींद भी, कहानी भी
हाए! क्या चीज़ है जवानी भी

दिल को शोलों से करती है सैलाब
ज़िन्दगी आग भी है, पानी भी

(शोला : fire ball; सैलाब : flood)

हर्फ क्या क्या मुझे नहीं कहती
कुछ सुनूँ मैं तेरी ज़ुबानी भी

(हर्फ : words)

पास रहना किसी का रात की रात
मेहमानी भी, मेज़बानी भी

(मेहमानी : to visit as a guest; मेज़बानी : to host a guest)

सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता


सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता आहिस्ता

(रुख़ : face; नक़ाब : veil; आहिस्ता आहिस्ता : slowly, slowly; आफ़ताब : The Sun)

जवां होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया परदा
हया यकलख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता

(हया : shyness; यकलख़्त : at once, instantaneously; शबाब : youth)

सवाल-ए-वस्ल पे उनको उदू का खौफ़ है इतना
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता

(सवाल-ए-वस्ल : question about meeting; उदू : competitor, rival; खौफ़ : fear)

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क है इतना
इधर तो जल्दी-जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता

शब-ए-फ़ुर्क़त का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब, आहिस्ता आहिस्ता

(शब-ए-फ़ुर्क़त : night of separation; फ़रिश्तों : O! angels; फ़ुर्सत : leisure, convenience; हिसाब : an account for deeds)

वो बेदर्दी से सर काटें ‘अमीर’ और मैं कहूँ उनसे
हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता

(बेदर्दी : cruelty; हुज़ूर : Sir; जनाब : His Excellency)

दोस्त बन बन के मिले मुझको मिटानेवाले


दोस्त बन बन के मिले मुझको मिटाने वाले
मैं ने देखे हैं कई रंग बदलने वाले

तुमने चुप रहकर सितम और भी ढाया मुझ पर
तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पे हंसनेवाले

(सितम : injustice)

मैं तो इख़लाक़ के हाथों ही बिका करता हूं
और होंगे तेरे बाज़ार में बिकनेवाले

(इख़लाक : good nature)

आख़री बार सलाम-ए-दिल-ए-मुज़्तर ले लो
फिर ना लौटेंगे शब-ए-हिज्र पे रोनेवाले

(आख़री : last; सलाम-ए-दिल-ए-मुज़्तर : salutation from the distressed heart)

किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी


किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
मुझको अहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

(रंजिश : animosity; अहसास : realisation; ज़िंदा : alive)

मेरे रुकने से मेरी साँस भी रुक जाएँगी
फ़ासले और बढ़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

(साँस : breath; फ़ासले : distance)

ज़हर पीने की तो आदत थी ज़मानेवालों
अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

(ज़हर : poison; ज़मानेवालो : people)

चलती राहों में यूँ ही आँख लगी है ‘फ़ाकिर’
भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

ग़म बढे आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह


ग़म बढे आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह
तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह

(ग़म : sorrows; क़ातिल : murderer; निगाहें : eyes)

अपनी नज़रों में गुनहगार न होते, क्यों कर
दिल ही दुश्मन हैं मुखालिफ़ के गवाहों की तरह

(नज़रों : eyes; गुनहगार : sinful; मुखालिफ़ : opposition, enemy; गवाहों : witnesses)

हर तरफ़ ज़ीस्त की राहों में कड़ी धूप है दोस्त
बस तेरी याद का साया है पनाहों की तरह

(ज़ीस्त : life; साया : shade; पनाहों : refuge)

जिनके ख़ातिर कभी इल्ज़ाम उठाए, ‘फ़ाकिर’
वो भी पेश आए हैं इन्साफ़ के शाहों की तरह

(ख़ातिर : for the sake; इल्ज़ाम : accusations; इन्साफ़ : justice; शाह : king)

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी


बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशां क्यूं हो
उँगलियाँ उठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ
इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ
चूड़ियों पर भी कई तन्ज़ किये जायेंगे
कांपते हाथों पे भी फ़िक़रे कसे जायेंगे
लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ताना देंगे
बातों बातों मे मेरा ज़िक्र भी ले आयेंगे
उनकी बातों का ज़रा सा भी असर मत लेना
वर्ना चेहरे के तासुर से समझ जायेंगे
चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उनसे
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी

(बेवजह : without reason; परेशां : worried; तन्ज़ : taunts; फ़िक़रे : comments; ज़ालिम : cruel; ज़िक्र : talk; असर : effect; तासुर : feelings; सवालात : questions)

अक्टूबर 14, 2006

आए हैं समझाने लोग


आए हैं समझाने लोग
हैं कितने दीवाने लोग

दैर-ओ-हरम में चैन जो मिलता
क्यूं जाते मैखाने लोग

(दैर-ओ-हरम : temple and the mosque; चैन : solace; मैखाने : tavern, wine-house)

जान के सब कुछ कुछ भी ना जाने
हैं कितने अन्जाने लोग

(अन्जाने : strangers)

वक़्त पे काम नहीं आते हैं
ये जाने पहचाने लोग

अब जब मुझको होश नहीं है
आए हैं समझाने लोग

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं


बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं

तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं

मेरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान-ओ-ईमान है
निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं

(नज़रें : eyes, glances; क़ातिल : murderer; जान-ओ-ईमान : life and belief)

‘फिराक़’ बदल कर भेष मिलता है कोई क़ाफ़िर
कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं

(क़ाफ़िर : non-believer)

दर्द बढ कर फुगाँ ना हो जाये


दर्द बढ कर फुगाँ ना हो जाये
ये ज़मीं आसमाँ ना हो जाये

(फुगाँ : lamentation; ज़मीं : earth; आसमाँ : sky)

दिल में डूबा हुआ जो नश्तर है
मेरे दिल की ज़ुबाँ ना हो जाये

(नश्तर : dagger; ज़ुबाँ : voice)

दिल को ले लीजिए जो लेना हो
फिर ये सौदा गराँ ना हो जाये

(सौदा : bargain; गराँ : costly)

आह कीजिए मगर लतीफ़-तरीन
लब तक आकर धुआँ ना हो जाये

(आह : sigh; लतीफ़-तरीन : pleasant; धुआँ : smoke)

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