कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

नवम्बर 6, 2007

रिश्ता ये कैसा है नाता ये कैसा है


रिश्ता ये कैसा है नाता ये कैसा है,
पहचान जिस से नहीं थी कभी,
अपना बना है वही अजनबी,
रिश्ता ये कैसा है नाता ये कैसा है,

तुम्हे देखते ही रहूं मै,
मेरे सामने यूं ही बैठे रहो तुम,
करूं दिल की बातें मै खामोशियों से,
और अपने लबों से ना कुछ भी कहो तुम,

ये रिश्ता है कैसा ये नाता है कैसा,
तेरे तन की ख़ुशबू भी लगती है अपनी,
ये कैसी लगन है ये कैसा मिलन है,
तेरे दिल की धड़कन भी लगती है अपनी,

तुम्हे पा के महसूस होता है ऐसे,
के जैसे कभी हम जुदा ही नहीं थे,
ये माना के जिस्मों के घर तो नये हैं,
मगर हैं पुराने ये बंधन दिलों के,

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