कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 14, 2006

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं


बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं

तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं

मेरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान-ओ-ईमान है
निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं

(नज़रें : eyes, glances; क़ातिल : murderer; जान-ओ-ईमान : life and belief)

‘फिराक़’ बदल कर भेष मिलता है कोई क़ाफ़िर
कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं

(क़ाफ़िर : non-believer)

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