कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

नवम्बर 7, 2007

मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुकसत कर दो


मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुकसत कर दो,
साथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर से,
अपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताज,
फेंक दो जिस्म से किरणों का सुनहरी ज़ेवर,
तुम्ही तन्हा मेरा गम खाने मे आ सकती हो,
एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रखा है,
मेरे जलते हुए सीने का दहकता हुआ चाँद,

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