कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

सितम्बर 18, 2007

मुझे गुसा दिखाया जा रहा है


मुझे गुसा दिखाया जा रहा है,
तबस्सुम को दबाया जा रहा है,

वहाँ तक आबरू जब्त-ऐ-गम है,
जहाँ तक मुस्कुराया जा रहा है,

दो आलम मैंने छोडे जिसके खातिर,
वही दामन छुडाया जा रहा है,

क़रीब आने में है उनको तकल्लुफ,
वहीँ से मुस्कुराया जा रहा है,

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