कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

फ़रवरी 20, 2009

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो


धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

Singer: Jagjit Singh
Lyrics: Nida Fazli

अक्टूबर 31, 2007

बहुत खूबसूरत है आँखे तुम्हारी


बहुत खूबसूरत है, आँखे तुम्हारी,
अगर हो इनयात, ऐ जाने मोहब्बत,
गारा देगी ये दिल को, किस्मत हमारी,

जो सबसे जुदा है, वो अंदाज़ हो तुम,
छुपा था जो दिल मे, वो ही राज़ हो तुम,

तुम्हारी नजाकत, बनी जबसे चाहत,
सुकून बन गई है, हर एक बेकरारी,

न थे जब तलक तुम, हमारी नजर में,
न था चाँद शब में, न सूरज सहर में,

तुम्हारी इजाज़त, तुम्हारी हुकूमत,
ये सारा गगन है, ये धरती है सारी,

अक्टूबर 30, 2007

यूं तो गुज़र रहा है हर इक पल खुशी के साथ


यूं तो गुज़र रहा है, हर इक पल खुशी के साथ,
फिर भी कोई कमी सी है, क्यों ज़िंदगी के साथ,

रिश्ते वफाये दोस्ती, सब कुछ तो पास है,
क्या बात है पता नही, दिल क्यों उदास है,
हर लम्हा है हसीन, नई दिलकशी के साथ,

चाहत भी है सुकून भी है दिल्बरी भी है,
आखों में खवाब भी है, लबो पर हसी भी है,
दिल को नही है कोई, शिकायत किसी के साथ,

सोचा था जैसा वैसा ही जीवन तो है मगर,
अब और किस तलाश में बैचैन है नज़र,
कुदरत तो मेहरबान है, दरयादिली के साथ,

मई 19, 2007

तेरी आँखों से ही जागे सोये हम


तेरी आँखों से ही जागे सोये हम
कब तक आखिर तेरे ग़म को रोये हम
वक्त का मरहम ज़ख़्मों को भर देता है ,
शीशे को भी ये पत्थर कर देता है ।
रात में तुझको पाऐं , दिन में खोये हम ।
हर आहट पर लगता है तू आया हैं ,
धूप है मेरे पीछे आगे साया है ,
खुद अपनी ही लाश को कब तक ढोये हम ।
तेरी आँखों से ही जागे सोये हम…….

दिसम्बर 20, 2006

बेनाम सा ये दर्द


बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नही जाता,
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नही जाता,

सब कुछ तो है क्या ढूंढती हैं ये निगाहें,
क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यों नहीं जाता,

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहां मे,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नही जाता,

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यों नहीं जाता,

वो नाम जो बरसो से ना चेहरा ना बदन है,
वो ख्वाब अगर है तो बिखर क्यों नहीं जाता

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