कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

दिसम्बर 19, 2006

सोचा नहीं अच्छा-बुरा


सोचा नहीं अच्छा-बुरा, देखा-सुना कुछ भी नहीं..
मांगा खुदा से रात-दिन, तेरे सिवा कुछ भी नहीं..

देखा तुझे, सोचा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे..
मेरी खता मेरी वफ़ा, तेरी खता कुछ भी नहीं..

जिस पर हमारी आंख ने मोती बिछाये रात-भर..
भेजा वोही कागज़ उन्हे, लिखा मगर कुछ भी नहीं..

एक शाम की दहलीज पर, बैठे रहे वो देर तक..
आंखों से की बातें बहुत, मुह से कहा कुछ भी नहीं..

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