कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 26, 2007

वो ख़त के पुर्जे उडा रहा था


वो ख़त के पुर्जे उडा रहा था,
हवाओं का रूख दिखा रहा था,

कुछ और भी हो गया नुमाया,
मैं अपना लिखा मिटा रहा था,

उसी का इमा बदल गया है,
कभी जो मेरा खुदा रहा था,

वो एक दिन एक अजनबी को,
मेरी कहानी सुना रहा था,

वो उम्र कम कर रहा था मेरी,
मैं साल अपने बढ़ा रहा था,

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