कुछ पल जगजीत सिंह के नाम

अक्टूबर 13, 2007

जिन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं


जिन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं,

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं,
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं,

सच घटे या बडे तो सच न रहे,
झूठ की कोई इन्तेहा ही नहीं,

जड़ दो चांदी में चाहे सोने में,
आइना झूठ बोलता ही नहीं,

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रिश्ता क्या है तेरा मेरा


रिश्ता क्या है तेरा मेरा,
मैं हूँ शब और तू है सवेरा,

तू है चाँद सितारों जैसा,
मेरी किस्मत घोर अँधेरा,

फूलों जैसे राहें तेरी,
काटों जैसा मेरा डेरा,

आता जाता है ये जीवन,
पल-दो-पल का रैन बसेरा,

मैं न हिंदू न मुसलमान मुझे जीने दो


मैं न हिंदू न मुसलमान मुझे जीने दो,
दोस्ती है मेरा इमान मुझे जीने दो,

कोई एहसान न करो मुझपे तो एहसान होगा,
सिर्फ़ इतना करो एहसान मुझे जीने दो,

सबके दूख-दर्द को अपना समझ के जीना,
बस यही है मेरा अरमान मुझे जीने दो,

लोग होते हैं जो हैरान मेरे जीने से,
लोग होते रहे हैरान मुझे जीने दो,

अक्टूबर 17, 2006

एक बराह्मण ने कहा कि ये साल अच्छा है


एक बराह्मण ने कहा कि ये साल अच्छा है
ज़ुल्म की रात बहुत जल्द टलेगी अब तो
आग चुल्हों में हर इक रोज़ जलेगी अब तो
भूख के मारे कोई बच्चा नहीं रोएगा
चैन की नींद हर इक शख्स़ यहां सोएगा
आंधी नफ़रत की चलेगी न कहीं अब के बरस
प्यार की फ़सल उगाएगी जमीं अब के बरस
है यहीं अब न कोई शोर-शराबा होगा
ज़ुल्म होगा न कहीं ख़ून-ख़राबा होगा
ओस और धूप के सदमें न सहेगा कोई
अब मेरे देश में बेघर न रहेगा कोई

नए वादों का जो डाला है वो जाल अच्छा है
रहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्छा है

दिल के ख़ुश रखने को गा़लिब ये ख़याल अच्छा है

अक्टूबर 16, 2006

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

Filed under: Albums,Jagjit Singh,Mirage — Amarjeet Singh @ 6:30 अपराह्न
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अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं।

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैं।

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं किस राहग़ुज़र के हम हैं।

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